Class 9th History

Class 9th History Chapter Wise Short Long Type Question | इतिहास की दुनिया चैप्टर नाम- “विश्वयुद्धों का इतिहास” का प्रशन

Class 9th History Chapter Wise Short Long Type Question | इतिहास की दुनिया चैप्टर नाम- “विश्वयुद्धों का इतिहास” का प्रशन


Class 9th – कक्षा 9वीं

विषय – इतिहास की दुनिया

Objective Question (वस्तुनिष्ठ प्रशन)

चैप्टर का नाम- विश्वयुद्धों का इतिहास (History of World War)  


लघु उत्तरीय प्रश्न ⇒


1. प्रथम विश्वयुद्ध के उत्तरदायी किन्हीं चार कारणों का उल्लेख करें। 

उत्तर⇒ प्रथम विश्वयुद्ध के उत्तरदायी चार कारण निम्नलिखित थे- 

(i) गुटों का निर्माण – 1882 में जर्मनी, आस्ट्रिया-हंगरी तथा इटली तीन देशों ने त्रिगुट बनाया। इस गुट के विरोध में 1907 में फ्रांस, रूस तथा ब्रिटेन ने एक त्रिदेशीय संधि बनाई। इन गुटों की उपस्थिति ने युद्ध को अनिवार्य बना दिया। 

(ii) साम्राज्यवाद : औद्योगिक क्रांति के कारण यूरोपीय देशों के सम्मुख व्यावसायिक माल की खपत और कल-कारखानों के लिए कच्चे माल की प्राप्ति की समस्या उत्पन्न हुई जिसका हल उन्हें साम्राज्य विस्तार में दिखाई दिया। इस प्रकार साम्राज्य विस्तार की भूख युद्ध का कारण बना। 

(iii) उग्र राष्ट्रीयता: उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्धतक यूरोप के देशों में राष्ट्रीयता का संचार उग्र रूप से होने लगा। अतः जब यूरोप की विभिन्न जातियाँ अपने सभ्यता, धर्म और संस्कृति का पाठ संसार को पढ़ाने के लिए आगे बढ़ी तो उनके परस्पर संघर्ष होना आवश्यक हो गया जिसका अंतिम रूप प्रथम विश्वयुद्ध था।

(iv) सैनिकवाद : उग्र राष्ट्रीयता तथा साम्राज्यवाद की मनोवृत्ति ने यूरोपीय राष्ट्रों का ध्यान सैनिकवाद की ओर आकर्षित किया। अतः यूरोपीय देश अपनी सैनिक शक्ति बढ़ाने लगे। सभी देश एक-दूसरे को संदेह तथा शत्रुता की नजर से देखने लगे। अतः यह भी युद्ध का एक कारण बन गया।


2. त्रिगुट तथा त्रिदेशीय संधि में कौन-कौन से देश शामिल थे? इन गुटों की स्थापना का उद्देश्य क्या था ? 

उत्तर⇒ त्रिगुट में जर्मनी, आस्ट्रिया-हंगरी और इटली शामिल थे तथा त्रिदेशीय संधि में फ्रांस, रूस और ब्रिटेन शामिल थे। इन दोनों गुटों में शामिल देशों का प्रमुख उद्देश्य, अपने अधीन उपनिवेशों का विस्तार करना था। इन गुटों का उद्देश्य अन्य देशों के प्रति घृणा फैलाना, अपने देश को दूसरों से श्रेष्ठ बतलाना तथा युद्ध को गौरवपूर्ण सिद्ध करना था। इनका अन्य उद्देश्य अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाना, अपनी सेना तथा नौसेना का आकार बढ़ाना, नये और अपेक्षाकृत अधिक संघातिक हथियारों का विकास करना था तथा ये अपने को युद्ध के लिए सामान्यतया तैयार रखने के लिए अपार धनराशि खर्च करने लगे थे।


3. प्रथम विश्वयुद्ध का तात्कालिक कारण क्या था ? 

उत्तर⇒ अनेक कारणों से युद्ध के लिए विस्फोटक स्थिति पैदा हो चुकी थी और अन्दर-ही-अन्दर युद्ध की चिनगारी सुलग रही थी। ऐसी विस्फोटक स्थिति में आस्ट्रिया का राजकुमार आर्क ड्यूक फर्डिनेण्ड 28 जून, 1914 को अपनी पत्नी सहित बोस्निया की राजधानी सेराजीवो गया। वहाँ एक सर्व क्रांतिकारी ने बम फेंककर हत्या कर दी। आस्ट्रिया में इस घटना की कड़ी प्रतिक्रिया हुई । आस्ट्रिया की सरकार ने इस हत्या की जिम्मेदारी सर्विया की सरकार पर डालकर उसे अंतिम चेतावनी (अल्टीमेटम) दे दी। किन्तु सर्विया की सरकार ने अंतिम चेतावनी को अस्वीकार कर दिया। फलस्वरूप आस्ट्रिया ने 28 जुलाई, 1914 को सर्विया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी, जिसने धीरे-धीरे विश्वयुद्ध का विकराल रूप धारण कर लिया।


4. सर्वस्लाव आन्दोलन का क्या तात्पर्य है ? 

उत्तर⇒ सर्वस्लाव आन्दोलन उस आन्दोलन को कहते हैं जो बाल्कन राज्यों में ऑटोमन साम्राज्य के विरुद्ध 19वीं शताब्दी के अन्त तथा 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में शुरू हुआ। इस सर्वस्लाव आन्दोलन का उद्देश्य बाल्कन क्षेत्र में एक संगठित राज्य का गठन करना था । यह इस सिद्धांत पर आधारित था कि पूरे क्षेत्र में रहने वाले स्लाव लोग एक जनगण के हैं इसलिए उन्हें एक पृथक स्लाव राज्य का निर्माण करना चाहिए। रूसी सम्राट ने इस आन्दोलन को बढ़ावा दिया। सर्विया ने उन क्षेत्रों को संगठित करने की कोशिश की जिनमें स्लाव जाति के लोग तुर्की तथा आस्ट्रिया साम्राज्य में रहते थे। इस तरह रूस ने दोनों ऑटोमन और आस्ट्रिया-हंगरी के विरुद्ध आन्दोलन को बढ़ावा दिया। तुर्की साम्राज्य और आस्ट्रिया-हंगरी के स्लाव बहुल क्षेत्रों को एक करने का नेतृत्व बाल्कन प्रायद्वीप का एक प्रमुख देश सर्विया कर रहा था ।


5. उग्र राष्ट्रीयता प्रथम विश्वयुद्ध का किस प्रकार एक कारण था ? 

उत्तर⇒ 1870 से 1914 के काल में यूरोप में उम्र राष्ट्रीयता की भावनाएँ प्रबल थीं। इसका परिणाम यह हुआ कि यूरोप के विभिन्न राष्ट्र अपने स्वार्थ तथा हित में इतने अंधे हो गये कि वे एक-दूसरे से झगड़ने लगे। उन्होंने दूसरे देशों को लूटना, गुलाम बनाना तथा शोषण करना प्रारंभ किया। इस प्रकार की उम्र राष्ट्रीयता इंगलैण्ड, स्पेन, पुर्तगाल, जर्मनी, इटली, बेल्जियम, हॉलैंड, फ्रांस आदि देशों में विकसित हुई। इनके फलस्वरूप राष्ट्रों में पारस्परिक घृणा और द्वेष की स्थिति पैदा कर दी। अतः उनके बीच परस्पर संघर्ष होना आवश्यक हो गया, जिसका अंतिम रूप प्रथम विश्वयुद्ध था । हम कह सकते हैं कि उग्र राष्ट्रीयता प्रथम विश्वयुद्ध का आधारभूत कारण था । इस प्रकार उग्र राष्ट्रीयता यूरोप के लिए एक अभिशाप सिद्ध हुई ।


6. “द्वितीय विश्वयुद्ध प्रथम विश्वयुद्ध की ही परिणति थी।” कैसे ? 

उत्तर⇒ प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् वर्साय एवं अन्य संधियों के माध्यम से शांति स्थापित करने और द्वेष की भावना को मिटाने के प्रयत्न किये गये थे। परन्तु इन संधियों का व्यावहारिक रूप शांति स्थापित करने का नहीं था। इन संधियों में अनेक भूलें तथा त्रुटियाँ थीं, जिनके कारण भविष्य में युद्ध अवश्यम्भावी था। बाल्कन के कई प्रान्तों को अंग-भंग कर दिये गये थे। यूगोस्लाविया एवं चेकोस्लोवाकिया का निर्माण ही पड़ोसी राज्यों को तोड़-फोड़ कर किया गया था। जर्मनी का अधिकांश हिस्सा पोलैंड में मिला दिया गया था या फ्रांस को दे दिया गया था। उसको आर्थिक, राजनीतिक एवं सैनिक दृष्टि से दुर्बल बनाने का प्रयास किया गया था। आस्ट्रिया एवं हंगरी का भी अंग-भंग करके उसे छोटा कर दिया गया था। जर्मनी और टर्की के उपनिवेशों को छीनकर मित्रराष्ट्रों को धरोहर के रूप में दे दिये गये थे। इन सारी व्यवस्थाओं से द्वेष, रोष और घृणा की भावना बढ़ रही थी । पराजित राष्ट्रों ने विवशताओं के कारण ही संधियों को स्वीकार की थी और वे अवसर की ताक में थे कि कब अपना खोया हुआ सम्मान प्राप्त कर लें। विशेष रूप से जर्मनी को दबाने का प्रयत्न वर्साय की संधि में किया गया था। अतः वर्साय व्यवस्था को युद्ध का एक कारण माना जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। इस प्रकार यह कहना गलत भी गलत नहीं होगा कि द्वितीय विश्वयुद्ध प्रथम विश्वयुद्ध की ही परिणति थी।


7. द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए हिटलर कहाँ तक उत्तरदायी था ? 

उत्तर⇒  पेरिस शांति सम्मेलन के निर्णयों से असंतुष्ट जर्मनी में उग्र राष्ट्रवाद की भावना जोर पकड़ने लगी। जर्मनी में नाजीवाद का उदय उग्र राष्ट्रवाद का परिणाम था। ‘युद्ध अपराध’ का कलंक धोने के लिए जर्मनी व्याकुल और आतुर था। नाजी क्रांति और हिटलर के अभ्युदय ने जर्मन लोगों की भावना के अनुरूप इस कलंक को धोने का प्रयत्न किया। उसने अपने खोये हुए प्रदेशों को प्राप्त करना शुरू कर दिया। वर्साय की संधि को ठुकरा दिया और शस्त्रीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया। उसने जर्मन जनता से कहा – “युद्ध मेरे समय में ही छिड़ जाना चाहिए” हिटलर के उग्रवाद ने युद्ध को अनिवार्य बना दिया। अतः हम कह सकते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध हिटलर की आक्रामक नीति का तार्किक परिणाम था ।


8. द्वितीय विश्वयुद्ध के किन्हीं पाँच परिणामों का उल्लेख करें। 

उत्तर⇒ द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम निम्नलिखित हुए- 

(i) द्वितीय विश्वयुद्ध व्यापक रूप से विनाशकारी सिद्ध हुआ।

(ii) द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामस्वरूप अल्बानिया, यूगोस्लाविया, पोलैण्ड, हंगरी, रूमानिया, वल्गेरिया आदि यूरोपीय देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों का शासन हो गया। 

(iii) द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामस्वरूप यूरोपीय प्रभुत्व समाप्त हो गया। (iv) द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत रूस दो महाशक्तियों का उदय हुआ । 

(v) इसके परिणामस्वरूप 24 अक्टूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई।


9. तुष्टिकरण की नीति क्या है? 

उत्तर⇒ तुष्टिकरण की नीति का तात्पर्य है किसी को खुश करने के लिए नीति अपनाना। उदाहरण के लिए पश्चिमी देशों ने फासिस्टों के प्रति द्वितीय महायुद्ध से पूर्व तुष्टिकरण की विदेश नीति अपनाई । अब प्रश्न उठता है कि इटली, जर्मनी और जापान जैसे फासिस्ट शक्तियों के प्रति तुष्टिकरण की नीति क्यों अपनाई गई ? वास्तव में 1917 की रूसी क्रांति के पश्चात् पश्चिमी देशों को साम्यवाद का भय खाये जा रहा था। इसलिए जब-जब हिटलर एवं मुसोलिनी जैसे फासिस्ट नेताओं ने अनुचित एवं उत्तेजित कार्य किए तब-तब पश्चिम देश चुप रहे। इससे जर्मनी, इटली तथा जापान के हौसले बढ़ते गये तथा फासिस्टवाद का उदय एवं प्रसार हुआ। ऐसे में पश्चिमी देश यह सोचने लगे थे कि फासिस्ट देश उन्हें समाजवाद और साम्यवाद के खतरे से मुक्ति दिलाएँगे। इसी कारण उन्होंने फासिस्ट देशों के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपनाई । इस नीति के कारण आक्रामक कार्यवाहियाँ बढ़ीं और दूसरा महायुद्ध हुआ।


10. राष्ट्रसंघ क्यों असफल रहा? 

उत्तर⇒ 10 जनवरी, 1920 को राष्ट्रसंघ का जीवन विधिवत प्रारंभ हुआ। हथियारबन्दी की होड़ को रोकना और राज्यों के झगड़ों को युद्ध के अतिरिक्त अन्य शांतिमय उपायों से फैसला करने का यत्न करना राष्ट्रसंघ का असल उद्देश्य था । छोटे-छोटे राज्यों के झगड़ों को सुलझाने में राष्ट्रसंघ काफी सफल रहा, परन्तु बड़े-बड़े राष्ट्रों के विवाद में राष्ट्रसंघ को कोई सफलता नहीं प्राप्त हो सकी। अतः राष्ट्रसंघ के द्वारा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर शांति एवं परस्पर सहयोग का जो महान् प्रयास था, वह अल्पकाल में ही समाप्त हो गया। इसके कई कारण थे। राष्ट्रसंघ की व्यावहारिक सफलता बड़े एवं शक्तिशाली राष्ट्रों के सहयोग पर निर्भर करती थी। परन्तु राष्ट्रसंघ प्रारंभ से ही इस सहयोग से वंचित था। दूसरा कारण यह था कि शक्तिशाली राष्ट्रों की निरंकुश एवं आक्रामक नीति ने राष्ट्रसंघ को कमजोर किया। राष्ट्रसंघ की असफलता की पृष्ठभूमि का सृजन 1929-30 के आर्थिक संकट ने किया। इस भीषण संकट ने सब देशों को अपनी आर्थिक दशा सुधारने के लिए तरह-तरह के आर्थिक प्रतिबन्ध, संरक्षण, सीमा कर आदि लगाने को बाध्य किया। प्रत्येक देश ने अपनी स्थिति को एक-दूसरे से पृथक रखकर दृढ़ बनाने की कोशिश की। फलतः अन्तरराष्ट्रीयता की भावना कमजोर पड़ने लगी और आर्थिक सहयोग के स्थान पर आर्थिक प्रतिद्वन्द्विता का जन्म हुआ।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ⇒


1. प्रथम विश्वयुद्ध के क्या कारण थे? संक्षेप में लिखें। 

उत्तर⇒ प्रथम विश्वयुद्ध के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे- 

(i) यूरोपीय शक्तिशाली देशों में साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा : यूरोप के फ्रांस, इंगलैंड, जर्मनी, आस्ट्रिया आदि शक्तिशाली देशों में विशाल साम्राज्य स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो गई। जर्मनी एशिया तथा अफ्रीका में अपने उपनिवेश बढ़ाने के लिए विशेष रूप से उत्सुक था। उपनिवेशों की स्थापना केवल युद्ध द्वारा ही हो सकती थी।

(ii) विभिन्न गुटों का निर्माण : फ्रांस तथा जर्मनी एवं आस्ट्रिया तथा रूस के बीच भारी शत्रुता उत्पन्न हो गई। इसके परिणामस्वरूप 1882 में जर्मनी, आस्ट्रिया तथा इटली ने मिलकर ट्रिपल एलायंस (त्रिगुट) की स्थापना की। इससे प्रभावित होकर 1907 में इंगलैंड, फ्रांस तथा रूस ने त्रिदेशीय संघ की स्थापना की । 

(iii) वाल्कन राज्यों का प्रश्न : बाल्कन प्रायद्वीप के देशों पर टर्की का लम्बे समय से अधिकार था। इन नगर राज्यों ने टर्की के विरुद्ध संघर्ष आरंभ कर दिया। इसमें यूरोपीयों ने हस्तक्षेप करना आरंभ कर दिया। इससे यूरोपीयन शक्तियों में अधिक-से-अधिक लाभ उठाने के लिए संघर्ष छिड़ गया। 

(iv) हथियारों की होड़ : यूरोपीय शक्तियों में हथियारों के निर्माण की होड़-सी लग गई। इसी होड़ ने प्रथम विश्वयुद्ध को जन्म दिया।

(v) फ्रांस तथा जर्मनी के मध्य शत्रुता : फ्रांस तथा जर्मनी के मध्य शत्रुता प्रथम विश्वयुद्ध का प्रमुख कारण था। जर्मनी 1871 में फ्रांस को पराजित कर उसके दो महत्त्वपूर्ण प्रांत अल्सास एवं लारेन छीन लिये थे। तभी से इन दोनों देशों के मध्य शत्रुता की नींव पड़ गई थी । फ्रांस के मन में प्रतिशोध की भावना थी। वह जर्मनी से इन दोनों प्रांतों को पुनः प्राप्त करके उससे अपने अपमान का बदला लेना चाहता था।


2. प्रथम विश्वयुद्ध के क्या परिणाम हुए?

उत्तर⇒ 1914 का प्रथम विश्वयुद्ध विश्व इतिहास की एक बड़ी भयंकर विनाशकारी घटना थी। इस युद्ध के निम्नलिखित परिणाम हुए- 

(i) राजतंत्र की समाप्ति – प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् रूस, आस्ट्रिया, हंगरी तथा जर्मनी में राजतंत्र समाप्त हो गया था। यह विश्वयुद्ध के कारण ही हुआ था । 

(ii) नये राष्ट्रों का उदय – प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् चेकोस्लोवाकिया, पोलैण्ड, यूगोस्लाविया, लिथुआनिया आदि कई नये देशों का उदय हुआ । 

(iii) जन-धन का विनाश- प्रथम विश्वयुद्ध में अपार जन एवं धन की हानि हुई। इस युद्ध में लगभग 90 लाख लोग मारे गये, 2 करोड़ 50 लाख के लगभग घायल हुए। युद्ध के बाद यूरोप में फैली महामारियों में भी लगभग 40 लाख व्यक्ति मारे गये। प्रथम विश्वयुद्ध में भारी आर्थिक विनाश हुआ था, जिससे विभिन्न राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाएँ छिन्न-भिन्न हो गयी थीं। भारी धन विनाश के कारण वस्तुएँ की कीमतें बहुत बढ़ गयीं, उत्पादन घटा और मुद्रा का अवमूल्यन हो गया। व्यापार और व्यवसाय चौपट हो गये थे। करोड़ों लोग बेरोजगार हो गये थे। 

(iv) दो महान शक्तिशाली राष्ट्रों का उदय – प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका सैनिक और आर्थिक दृष्टि से विश्व की सबसे महान शक्ति बन बैठा। बाद में साम्यवादी क्रांति के पश्चात् रूस भी महान शक्तियों की श्रेणी में आ गया। 

(v) अधिनायकों ( तानाशाहों) का उदय – प्रथम विश्वयुद्ध के बाद कई देशों में गणतंत्र की स्थापना हुई, परन्तु वे सरकारें दुर्बल सिद्ध हुईं। जिसके परिणामस्वरूप जर्मनी में हिटलर, इटली में मुसोलिनी तथा स्पेन में जनरल फ्रैंको आदि तानाशाहों ने शासन की बागडोर संभाली।


3. क्या वर्साय की संधि एक आरोपित संधि थी ? 

उत्तर⇒ वर्साय – संधि को एक ” आरोपित – संधि” की संज्ञा दी जाती है, इस सम्बन्ध में सबसे पहली विचारणीय बात यह है कि इसमें अन्तरराष्ट्रीय शिष्टाचार एवं रिवाज का उल्लंघन किया गया था। इस संधि को तैयार करते समय विजित राष्ट्रों को अलग रखा गया था । वियना सम्मेलन में एकत्र राज्यों के सम्मेलन में पराजित फ्रांस को भी आमंत्रित किया था। परन्तु, इस समय ऐसा नहीं किया। संधि उसको कहते हैं जिनकों दोनों पक्ष के लोग आपस में विचार-विनिमय करके करते हैं। लेकिन, वर्साय की संधि तो कोई संधि ही नहीं थी । यह मित्रराष्ट्रों का आदेश था, उनका हुक्म था जिसको स्वीकार करने के अतिरिक्त जर्मनी के सामने अन्य कोई मार्ग नहीं था। इसलिए प्रारंभ से ही जर्मनी के राजनीतिज्ञ इस संधि को “आरोपित संधि” की संज्ञा देते थे। उनका कहना था कि यह विजेताओं द्वारा विजितों पर लादी गयी संधि है और उसका आधार विचारों का परस्पर आदान-प्रदान नहीं है। वैसे तो युद्ध समाप्त करने वाली लगभग प्रत्येक संधि ‘आरोपित संधि’ होती है, लेकिन जैसा प्रोफेसर कार का कथन है, वर्साय संधि में आरोप का भाव सभी शांति संधियों की अपेक्षा अधिक स्पष्ट था। संधि पर अपना विचार व्यक्त करने के लिए जर्मनी को एक ही अवसर दिया गया और दूसरी बार जब संधि का संशोधित मसविदा उसको दिया गया तो धमकी के साथ कि अगर वह एक निश्चित समय तक हस्ताक्षर नहीं कर देगा तो युद्ध पुनः प्रारंभ कर दिया जाएगा। जैसा कि एडम्स गिवन्स ने लिखा है, “पारस्परिक सहानुभूति की अनुपस्थिति में यह एक शक्ति की शांति थी और उसकी शर्तों का कार्यान्वयन केवल उस समय तक संभव था जबतक कि वह शक्ति जिसने जर्मनी को हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया था, उसे कार्यान्वित करती रहे।” आगे चलकर अगर जर्मनी ने इस ‘आरोपित संधि’ का उल्लंघन भी किया तो इसको किसी भी दृष्टिकोण से अनुचित नहीं कहा जा सकता है। ब्रिटिश पार्लियामेंट में लार्ड ब्राइस ने कहा था कि शांति केवल संतोष से ही हो सकती है। इस संधि का परिणाम राष्ट्रों को असंतुष्ट बनाना है और इससे क्रांतियाँ और युद्ध होंगे।


4. विस्मार्क की व्यवस्था ने प्रथम विश्वयुद्ध का मार्ग किस तरह प्रशस्त किया ? 

उत्तर⇒ प्रथम विश्वयुद्ध का एक महत्त्वपूर्ण कारण गुप्त संधियाँ थीं, जिसका जन्मदाता जर्मनी के चांसलर बिस्मार्क था। 1879 में जर्मनी ने आस्ट्रिया-हंगरी के साथ गुप्त रूप से संधियाँ की थी। 1882 में इटली भी उस संधि में शामिल हो गया जिसके कारण त्रिगुट का जन्म हुआ । बिस्मार्क के प्रयत्न से रूस और फ्रांस आपस में नहीं मिल सके थे। 1890 में बिस्मार्क के पतन के बाद फ्रांस तथा रूस एक-दूसरे के करीब आ गये। 1894 में फ्रांस का भी समझौता हो गया। इंगलैंड ने अन्य यूरोपीय देशों को समझौता करते देखकर 1902 में जापान, 1904 में फ्रांस और 1907 में रूस से समझौता कर लिया, जिससे एक-दूसरे त्रिगुट का जन्म हुआ। इधर जर्मनी ने टर्की से भी समझौता कर लिया। इन सब नयी गुटबंदियों के परिणामस्वरूप सम्पूर्ण यूरोप दो गुटों विभाजित हो गया। एक ओर इंगलैंड, रूस और जापान थे और दूसरी ओर जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी, टर्की और इटली थे। 1914 के पूर्व यूरोप के सभी शक्तिशाली राष्ट्र दो प्रतिद्वन्द्वी गुटों में बँट चुके थे। दोनों ही गुट एक-दूसरे को सन्देह, घृणा और द्वेषपूर्ण दृष्टि से देखते थे। जर्मनी की थल तथा जल सेना की बढ़ती हुई शक्ति इंगलैंड सरकार के लिए भीषण चिन्ता का कारण बन रही थी । अतः इंगलैंड को भी जर्मनी, आस्ट्रिया और इटली के त्रिगुट के विरुद्ध फ्रांस और रूस द्वारा बनाए गए गुट में सम्मिलित होकर उसे त्रिराष्ट्रीय समझौते का रूप प्रदान करना पड़ा। ऐसी स्थिति में एक छोटी-सी घटना भी युद्धाग्नि को प्रज्वलित करने के लिए चिन्गारी का काम कर सकती थी। इसी के परिणामस्वरूप मोरक्को, बोस्निया और अगादीर के महान संकट यूरोप के सम्मुख उपस्थित हुई जिनके कारण युद्ध की काली घटाएँ यूरोपीय क्षितिज पर घिर आई तथा हथियारों की झंकार से महाद्वीप गूँज उठा। इन दोनों परस्पर विरोधी गुटों के उदय से यह निश्चित हो गया कि इन देशों में से किसी एक को भी उलझाने वाला संघर्ष एक यूरोप – व्यापी युद्ध का रूप धारण कर लेगा। अतः यह कहा जा सकता है कि बिस्मार्क की व्यवस्था ने प्रथम विश्वयुद्ध का मार्ग प्रशस्त किया।


5. द्वितीय विश्वयुद्ध के क्या कारण थे ? विस्तारपूर्वक लिखें। 

उत्तर⇒ इस युद्ध के निम्नलिखित कारण थे- 

(i) वर्साय की संधि एवं अन्य संधियों से उत्पन्न असंतोष – वर्साय एवं अन्य संधियों के माध्यम से शांति स्थापित करने और द्वेष की भावना को मिटाने के प्रयत्न किये गये थे। परन्तु इन संधियों का व्यावहारिक रूप शांति स्थापित करने का नहीं था। इन संधियों में अनेक भूलें तथा त्रुटियाँ थीं, जिनके कारण युद्ध अवश्यम्भावी था। युद्ध की पराजय के कारण उस समय तो तात्कालिक रूप से उन शर्तों को मान लिया गया, किन्तु स्वाभिमानी जर्मन राष्ट्र के मन में ही नहीं अपितु आस्ट्रिया, हंगरी तथा तुर्की जैसे राष्ट्रों के हृदय में प्रतिशोध की ज्वाला धीरे-धीरे प्रदीप्त होना अत्यंत स्वाभाविक था ।

(ii) राष्ट्रसंघ की दुर्बलता – प्रथम विश्वयुद्ध के बाद पारस्परिक समस्याओं को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने के उद्देश्य से राष्ट्रसंघ की स्थापना की गई थी। परन्तु राष्ट्र संघ अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त नहीं कर सका। वह निन्दा प्रस्ताव पारित करने वाली संस्था बनकर रह गई। वह जापान, इटली तथा जर्मनी के बढ़ते हुए कदमों को रोकने की कोशिश न कर सकी। 

(iii) तुष्टीकरण की नीति – पश्चिमी देशों ने तुष्टीकरण की नीति अपनाकर फासिज्म के बढ़ते हुए प्रभाव को इतनी अधिक हवा दी कि द्वितीय विश्वयुद्ध को टाला न जा सका। फ्रांस द्वारा अपमानित जर्मनी का सैन्यीकरण भी द्वितीय विश्वयुद्ध को गति एवं शक्ति प्रदान करने में सहायक सिद्ध हुआ। 

(iv) विभिन्न गुट वंदियाँ – द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व सम्पूर्ण यूरोप दो गुटों में बँट गया था। सबसे पहले फ्रांस, रूस, पोलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया, रुमानिया और यूगोस्लाविया ने गुट बनाया। इसके बाद जर्मनी, इटली और जापान ने अपना गुट बनाया। इनका गुट रोम, बर्लिन, टोकियो धुरी (धुरी राष्ट्र) के नाम से प्रसिद्ध हुआ । 1936 तक इंगलैंड और अमेरिका इन गुटों से अलग रहे, किन्तु अपने हितों की रक्षा के लिए इंगलैंड, फ्रांस के गुट में सम्मिलित हो गया। इनका गुट मित्रराष्ट्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इन गुटों ने पुनः विश्व में संदेह एवं अविश्वास का वातावरण उत्पन्न कर दिया।


6. द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामों का उल्लेख करें। 

उत्तर⇒ द्वितीय विश्वयुद्ध के महत्त्वपूर्ण परिणाम निम्नलिखित हुए- 

(i) अपार जन-धन का विनाश – द्वितीय विश्वयुद्ध व्यापक रूप से विनाशकारी सिद्ध हुआ। इस युद्ध में लगभग 2 करोड़ 50 लाख लोग मारे गये, लाखों लोग घायल हुए तथा अरबों की सम्पत्ति नष्ट हुई । बाल्टिक सागर से काले सागर तक का पूरा क्षेत्र पूर्णरूप से बर्बाद हो गया। हॉलैंड, बेल्जियम तथा फ्रांस में सैकड़ों लोग भूख से तड़प-तड़पकर मर गये। अमेरिकी बमबारी से जापान के हिरोशिमा एवं नागासाकी में मानवता का घोर संहार हुआ।

(ii) साम्राज्यवाद का अंत – द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पराधीन देशों में राष्ट्रीयता की भावना को प्रोत्साहन मिला और उन्होंने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष शुरू कर दिये । परिस्थितियों से बाध्य होकर इंगलैंड एवं अन्य देशों को अपने अधीन उपनिवेशों को स्वतंत्रता प्रदान करनी पड़ी । भारत, बर्मा, मलाया, मिस्त्र आदि देशों को इंगलैंड को स्वतंत्र करना पड़ा। फ्रेंच हिन्द-चीन में फ्रांसीसी साम्राज्य समाप्त हो गया। कम्बोडिया, लाओस और वियतनाम स्वतंत्र हो गये। हॉलैंड के उपनिवेशों जावा, सुमात्रा, बोर्नियो आदि ने हिन्देशिया संघ राज्य बनाया था, वह भी स्वतंत्र हो गया। बाद में अनेक अफ्रीकन देशों को भी स्वतंत्रता मिली। इस प्रकार साम्राज्यवाद का अन्त हो गया।

(iii) दो महाशक्तियों का उदय – यूरोप की प्रभुसत्ता क्षीण होते ही नये युग में संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत रूस दो महाशक्तियों का विश्व के राजनीतिक रंगमंच पर उदय हुआ। 

(iv) यूरोपीय प्रभुत्व की समाप्ति – द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामस्वरूप यूरोपीय प्रभुत्व समाप्त हो गया। अब यूरोप समस्या प्रधान के रूप में सामने आया । धुरी राष्ट्रों ने अपना साम्राज्य खो दिया। ब्रिटेन फ्रांस आदि भी शक्तिहीन हो गये।


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